बहुत पहले की बात नहीं है, 1990s की कारें सिर्फ ‘पुरानी गाड़ियाँ’ हुआ करती थीं। और सच कहें, तो उनमें से ज़्यादातर आज भी वही हैं (अगर अब भी चल रही हैं तो!)। लेकिन जैसे-जैसे ‘मिलेनियल्स’ की उम्र बढ़ रही है, उनकी जेब में पैसा आ रहा है, और वे अपनी जवानी की यादों में खो रहे हैं, इनमें से कई कारें अब सिर्फ ‘पुरानी’ नहीं, बल्कि ‘कलेक्टिबल’ (संग्रहणीय) बन गई हैं। उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं।
जाहिर है, फेरारी, बुगाटी और मैकलारेन जैसे ब्रांड्स की कारें तो हमेशा से ही महंगी रही हैं, लेकिन अब टोयोटा, मित्सुबिशी और वोक्सवैगन जैसी कंपनियों के कुछ मॉडल्स भी अपनी कीमत बढ़ाते नज़र आ रहे हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन सालों में 1990s की कारों की कीमतों में सबसे ज्यादा उछाल आया है। इन कारों की औसत कीमत में लगभग 78% का इजाफा हुआ है, जो कि एक बहुत बड़ा आंकड़ा है।
तो क्या है इस ‘पुराना सोना’ चमकने का राज?
- समय की मार… या मेहरबानी?: किसी भी खास चीज़ को ‘विंटेज’ या ‘क्लासिक’ बनने में लगभग 25 साल लगते हैं। तब तक कार की कीमत घटती रहती है, लेकिन एक पॉइंट के बाद, खास कारों की कीमत बढ़ने लगती है। यानी डिप्रिशिएशन का सिलसिला खत्म हो जाता है।
- यादों का सिलसिला: जैसे-जैसे ये कारें बूढ़ी हो रही हैं, वैसे-वैसे वो लोग भी बड़े हो रहे हैं जो 90s के दशक में टीनएजर या यंग एडल्ट थे। उस समय उनके पास शायद मित्सुबिशी 3000GT या होंडा सिविक की कीमत चुकाने के पैसे नहीं थे, लेकिन आज उनकी नौकरी लग गई है और वे अपने बचपन के सपने को पूरा कर सकते हैं। इसे ‘इमोशनल नॉस्टेल्जिया’ या ‘बचपन का बकाया’ चुकाना कह लीजिए!
- न तो ज्यादा पुरानी, न ज्यादा नई – बिल्कुल ‘गोल्डिलॉक्स जोन’: 1990s की कारें एक अनोखे दौर की प्रतिनिधि हैं। उस जमाने में कार निर्माताओं ने ऐसी गाड़ियां बनाना सीख लिया था जो छोटी और फ्यूल एफिशिएंट तो थीं ही, साथ ही ड्राइविंग में बेहद मजेदार भी थीं। इनमें आधुनिक कारों जैसी ढेर सारी कम्प्यूटर-सहायता नहीं थी, जिससे ड्राइवर को सड़क और कार का एक ‘रॉ’ और ‘मैकेनिकल’ कनेक्शन महसूस होता था। सीधे शब्दों में कहें तो, ड्राइविंग ‘वीडियो गेम’ नहीं, बल्कि असली ‘खेल’ जैसा लगता था।
- आराम और सुरक्षा का सही मेल: इन कारों में एयर कंडीशनिंग, पावर विंडोज और एयरबैग्स जैसी बुनियादी सुविधाएं भी होती थीं। यानी आप उन्हें रोजाना चला सकते हैं, बिना इस डर के कि वो बीच सड़क पर ‘दम तोड़’ देंगी। ये न तो इतनी पुरानी हैं कि हफ्ते में दो बार गैरेज का चक्कर लगाना पड़े, और न ही इतनी नई हैं कि ड्राइविंग का सारा मजा ही कम्प्यूटर ले ले।
ध्यान रहे, हर पुरानी कार ‘सोना’ नहीं बनती!
हम यहाँ सिर्फ उन ‘खास’ कारों की बात कर रहे हैं जो आमतौर पर स्पोर्ट्स या परफॉर्मेंस मॉडल हैं। 90s की कोई साधारण फैमिली सेडान अगर आपके गैरेज में खड़ी है, तो हो सकता है वह अभी भी सिर्फ एक पुरानी कार ही हो। हालाँकि, कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि ब्यूइक रोडमास्टर वैगन, जिनकी कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं।
सबसे मजेदार बात यह है कि आजकल 90s के पिकअप ट्रक भी लाखों रुपये में बिक रहे हैं। यह देखकर एक्सपर्ट्स भी सिर खुजाते हैं कि आखिर इन ‘साधारण’ ट्रकों का इतना कलेक्टर वैल्यू क्यों है!
एक और दिलचस्प वजह है 25 साल का नियम। अमेरिका जैसे देशों में, 25 साल पुरानी विदेशी कारों (जो शुरू में वहां बिकती नहीं थीं) को आसानी से इम्पोर्ट किया जा सकता है। इसी वजह से 1990s की जापानी ‘जीडीएम’ कारें, जैसे निसान स्काईलाइन जीटी-आर, पश्चिमी बाजारों में तहलका मचा रही हैं और उनकी कीमतें रातों-रात बढ़ रही हैं।

तो अगली बार जब आपको कोई 90s की कार सड़क पर दिखे, तो उसे सिर्फ एक पुरानी गाड़ी समझकर नजरअंदाज न करें। हो सकता है, वह चलता-फिरता खजाना हो!
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3 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या 1990s की हर पुरानी कार की कीमत बढ़ रही है?
बिल्कुल नहीं! यह जादू की छड़ी नहीं है कि 1990s की हर कार की कीमत बढ़ जाए। यह ट्रेंड खासतौर पर उन कारों के लिए है जो अपने समय में ‘आइकॉनिक’ थीं, जैसे स्पोर्ट्स कारें, हाई-परफॉर्मेंस वेरिएंट्स, या फिर कुछ अनोखी और कम संख्या में बनी कारें। आम फैमिली सेडान या हैचबैक की कीमत अभी भी उनकी हालत और माइलेज पर ही निर्भर करती है।
2. क्या 1990s की कारें रोजाना इस्तेमाल (डेली ड्राइव) के लिए अच्छी हैं?
हाँ, बिल्कुल! यही तो इनकी सबसे बड़ी खूबी है। 1990s की कारें न तो इतनी पुरानी हैं कि हर वक्त मैकेनिक के पास बैठनी पड़े, और न ही इतनी नई हैं कि उनमें ड्राइविंग का मजा ही न रहा हो। इनमें एसी, पावर विंडोज जैसी बुनियादी सुविधाएं होती हैं, जिससे रोजमर्रा की सवारी आरामदायक रहती है। हालाँकि, नई कारों के मुकाबले इनकी फ्यूल एफिशिएंसी कम और मेंटेनेंस थोड़ा ज्यादा हो सकता है।
3. क्या भारत में भी 1990s की कारों का कलेक्टर मार्केट है?
जी हाँ, भारत में भी यह ट्रेंड धीरे-धीरे पनप रहा है! कारें जैसे कि क्लासिक अंबेसडर या कॉन्टेसा तो हमेशा से ही कलेक्टर आइटम रही हैं, लेकिन अब 1990s की मारुति जिप्सी, अर्बन, एस्टे, होंडा सिटी (पहली जनरेशन), और टोयोटा क्वालिस जैसी कारों को भी कलेक्टर और एंथुजियस्ट्स की नजर से देखा जाने लगा है। एक अच्छी हालत वाली और अच्छे से मेंटेन की हुई 90s की कार की कीमत अब नई कारों से भी ज्यादा हो सकती है।









