राजस्थान का वो किला, जहां मौजूद है दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार; उदयपुर से महज इतने Km है दूर

By Rachnaa Kumari

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राजस्थान का नाम सुनते ही दिमाग में जो तस्वीर उभरती है—वो है रेगिस्तान, ऊँट, चटकीले पोशाक और ऊँचे-ऊँचे राजसी किले! यह राज्य अपनी जीवंत संस्कृति और जबरदस्त इतिहास के लिए तो जाना ही जाता है, लेकिन इसकी वास्तुकला तो दुनिया को हैरान कर देती है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल राजस्थान के 7 किले तो इसके जीते-जागते सबूत हैं।

कल्पना कीजिए एक ऐसी दीवार की…
जो इतनी लंबी हो कि आप उसके एक छोर से दूसरे छोर तक पैदल चलते-चलते थक जाएं। जो इतनी चौड़ी हो कि उस पर आठ घोड़े एक साथ दौड़ सकें! और जिसने सदियों तक एक पूरे राज्य को दुश्मनों से बचाया हो। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं राजस्थान के गौरव कुंभलगढ़ किले (Kumbhalgarh Fort) की, जिसे देखकर आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी!

यह कोई साधारण किला नहीं, बल्कि शौर्य, कला और जंगली जज़्बे का ऐसा मेल है, जो आज भी अरावली की पहाड़ियों में गर्व से खड़ा है। चलिए, आपको इस ऐतिहासिक चमत्कार की सैर करवाते हैं।

यहीं है भारत की अपनी ‘ग्रेट वॉल’
उदयपुर से लगभग 84 किलोमीटर दूर, अरावली की हरी-भरी पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बना यह किला 15वीं सदी में महाराणा कुंभा ने बनवाया था। उनकी नज़र में यह कोई महल नहीं, बल्कि मेवाड़ की सुरक्षा की कुंजी थी। इसलिए इसकी दीवारें इतनी मज़बूत और लंबी बनाई गईं कि दुश्मनों की नज़र में आने से पहले ही उनकी हिम्मत टूट जाए!

इस किले की परिधि दीवार करीब 36 किलोमीटर लंबी है, जो इसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार बनाती है। सुनने में भले ही आंकड़ा लगे, लेकिन असल में देखने पर ये इतनी भव्य है कि शब्द कम पड़ जाएं। सच कहें तो अगर इस दीवार पर दौड़ने की ठान लें, तो आपका एक दिन और 5-6 जोड़ी जूते… बस! 😉

मेवाड़ की शान और बहादुरी की कहानी
कुंभलगढ़ को ‘मेवाड़ की आंख’ भी कहा जाता था। यह किला सिर्फ लड़ाई के वक्त ही काम नहीं आता था, बल्कि मुसीबत के वक्त राजपरिवार की सबसे सुरक्षित शरणस्थली भी थी। जब मेवाड़ पर बनबीर ने कब्जा कर लिया था, तब छोटे उदयसिंह को इसी किले में छिपाकर रखा गया था। और बाद में वही युवराज उदयसिंह बने, जिन्होंने उदयपुर शहर बसाया।

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सबसे गर्व की बात—यही वो पावन जगह है जहाँ महाराणा प्रताप का जन्म हुआ! वो वीर योद्धा जिन्होंने अपने सिर से सिर झुकाना कभी नहीं सीखा। तभी तो यह किला राजस्थानियों की बहादुरी और स्वाभिमान का प्रतीक बन गया।

सिर्फ पत्थर नहीं, आस्था का भी केंद्र
कुंभलगढ़ सिर्फ एक सैन्य किला ही नहीं, बल्कि आस्था और कला का भी बड़ा केंद्र रहा है। हैरान कर देने वाली बात—यहाँ पर 60 से ज़्यादा हिंदू और जैन मंदिर हैं! हर मंदिर अपनी बारीक नक्काशी और वास्तुकला के साथ एक नई कहानी कहता है। लगता है मानो पत्थरों में भगवान ने सांसें भर दी हों।

हर कोने में छुपी है एक अलग कहानी
इस किले का हर हिस्सा एक रहस्य लिए हुए है:

  • ‘टूट्या का होड़ा’: एक पैदल चलने वाला रास्ता, जिस पर चलते हुए आपको लगेगा जैसे आप इतिहास के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं।
  • ‘दानीवाह’: ये रास्ता किले के पूर्वी हिस्से की तरफ जाता है।
  • ‘हीराबाड़ी’: पश्चिम की ओर जाने वाला ये रास्ता आपको ‘कुंवर पृथ्वीराज की छतरी’ तक ले जाता है—एक ऐसे योद्धा की याद दिलाता है जिसने अपनी जान दांव पर लगा दी, लेकिन हार नहीं मानी। कहते हैं उनके घोड़े का नाम ‘साहन’ था… शायद उनकी हिम्मत का भी साथी!

आज भी जिंदा है इतिहास का दिल
आज जब आप कुंभलगढ़ किले में कदम रखते हैं, तो हर पत्थर आपसे फुसफुसाकर अपना इतिहास सुनाना चाहता है। यह सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि एक जीता-जागता स्मारक है—जो साहस, संस्कृति और गौरव की मिसाल है।

इसी वजह से इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है, ताकि आने वाली नस्लें जान सकें कि भारत के पास भी एक ऐसी दीवार है—जो सिर्फ पत्थरों से नहीं, बल्कि वीरता, इतिहास और अदम्य साहस से बनी है।


कुंभलगढ़ किले के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. कुंभलगढ़ किला उदयपुर से कितनी दूरी पर स्थित है?

कुंभलगढ़ किला उदयपुर शहर से लगभग 84 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से कार या बाइक द्वारा यहाँ पहुँचने में लगभग 2 घंटे का समय लगता है।

2. क्या कुंभलगढ़ किले की दीवार वाक्च में दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार है?

जी हाँ! कुंभलगढ़ किले की परिधीय दीवार लगभग 36 किलोमीटर लंबी है, जो इसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी प्राचीन दीवार बनाती है। इसे अक्सर ‘भारत की ग्रेट वॉल’ के नाम से भी जाना जाता है।

3. कुंभलगढ़ किले का इतिहास में क्या महत्व है?

जी हाँ! कुंभलगढ़ किले की परिधीय दीवार लगभग 36 किलोमीटर लंबी है, जो इसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी प्राचीन दीवार बनाती है। इसे अक्सर ‘भारत की ग्रेट वॉल’ के नाम से भी जाना जाता है।

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